ईशान ध्यान मंदिर
A spiritual meditation space nurturing awareness, devotion, inner growth, and conscious living.
ईशान ध्यान मंदिर अवधारणा
ईशान ध्यान मंदिर परिवार सभी धर्मों, पंथ और धार्मिक एवं आध्यात्मिक समुदायों के प्रति सद्भावना रखता है और इनके द्वारा मानवता के लिए किए गए कार्य के प्रति कृतज्ञ है । भक्ति, ध्यान और स्वाध्यय के माध्यम से पूज्य स्वामी एवं गुरु माँ बिंदु सभी को उचित मार्गदर्शन प्रदान करते हैं । किसी भी देश विरोधी, धर्म विरोधी और मानवता विरोधी गतिविधियों तथा मानसिकता से ध्यान मंदिर परिवार कोसों दूर है । ईशान ध्यान मंदिर में उत्कृष्ठ विधियाँ सिखाई जाती हैं, जिनका साधक के द्वारा निरंतर अभ्यास करने से उसके जीवन में उच्चस्तरीय चेतना का विकास होता है और साधक अपने विचार और कर्म के प्रति जागरूक होता जाता है, फलस्वरुप अनावश्यक कर्मकांडों से साधक को समय के साथ मुक्ति मिलती जाती है ।
धर्म की पहली अवस्था का अर्थ प्रभु श्री राम ने माता सीता को उनके आग्रह पर बतलाया था ।
धर्म-
1) सम्पूर्ण मानवता का हित और विकास ।
2) प्रकृति को सुन्दर बनाना ।
3) मन के विकारों को पहचानना ।
ईशान ध्यान मंदिर के सभी क्रियाकलाप धर्म की इन्हीं व्यवस्थाओं से प्रेरित हैं।
ईशान ध्यान मंदिर का आधार और संरचना
भक्ति
ईशान ध्यान मंदिर की मूल ऊर्जा- भक्ति और उससे जुड़े भावों की है, जो साधक को गुरु के माध्यम से परम तत्व से जोड़ती है और उसका निरंतर विकास करती है ।
परम चेतना/हनुमान जी द्वारा स्वामी ईशान महेश जी से जो आध्यात्मिक उपन्यास लिखवाए जा रहे हैं, वे इसी क्रम में साधक की चेतना को उर्ध्वगति प्रदान करते हैं। स्वामी जी ने बताया है कि भक्ति‑भाव का मार्ग रसपूर्ण तथा हरा‑भरा है, जिससे साधक को कठिनाई कम होती है और वह करुणा, ज्ञान और प्रेम से ओत‑प्रोत हो जाता है।
करुणा
स्वामी जी द्वारा लिखे गये आध्यात्मिक उपन्यास “रघुवंशनाथम्” में प्रभु श्रीराम का जीवन‑चरित्र दिखाया गया है। इसमें प्रभु श्रीराम प्राणी‑जगत के प्रति करुणा के भाव से पूर्णत: भरे हुए हैं और हर प्रकार से उनके उत्थान के लिये प्रयत्नशील रहते हैं। प्रभु राम ने करुणा के भाव को प्राणी‑जगत के समूल विकास के लिए कल्याणकारी तत्त्व के रूप में स्वीकार किया है और इसी हेतु वनों में जाना भी स्वीकार किया।
ज्ञान एवं आत्मविश्लेषण
स्वामी ईशान मेहश जी के द्वारा लिखे गए आध्यात्मिक उपन्यासों में सभी वेद और उपनिषदों का समग्र ज्ञान भक्ति की माला में पिरोया गया है। इन उपन्यासों का सतत अध्ययन करने से साधक के सभी मनो‑विकारों तथा आध्यात्मिक उत्कंठाओं की तृप्ति होती है। धीरे‑धीरे साधक कर्मकाण्डों के बने जंगल से निकलकर ज्ञान रूपी सरोवर के शीतल जल और वायु का अनुभव करता है। ईशान महेश जी के आध्यात्मिक उपन्यासों में सभी पात्रों की मनोदशा का भी उन्मुक्त वर्णन है जो उनके अचेतन और अवचेतन मन की परतों को दर्शाता है जिससे साधक में भी आत्मविश्लेषण की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है।
प्रेम
प्रभु श्रीराम का माता सीता के प्रति समर्पित प्रेम सम्पूर्ण ‘रघुवंशनाथम’ का केन्द्र‑बिन्दु है। इसके साथ ही प्रेम के विभिन्न रूप भी स्वामी ईशान महेश जी के आध्यात्मिक उपन्यासों में वर्णित हैं, जो साधक को अभिभूत और भाव‑विभोर कर देते हैं।एक भक्त, भक्त के रूप में प्रेम के विभिन्न आयामों को जानकर, अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व को प्रेमपूर्ण बना लेता है। तब स्वयं प्रभु कब साधक के हृदय में विराजमान हो जाते हैं, यह साधक को भी आभास नहीं होता।
धन
स्वामी ईशान महेश जी ने धन का महत्व ध्यान और साधना के संदर्भ में बताया है। उन्होंने कहा है कि मनुष्य को धन कमाने के लिये सही दिशा में हर संभव प्रयास करते हुए पुरुषार्थ करना चाहिए। जब साधक उचित मात्रा में धन अर्जित करता है, तब उसके परिवार और समझ का विकास भी होता है और ध्यान के मार्ग पर साधनों का अभाव नहीं रहता। फलस्वरूप साधक मन लगाकर गुरु के निर्देशन में आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर रह सकता है।
ध्यान
स्वामी ईशान महेश जी और गुरु माँ के पास हिमालय के योगियों की ऊर्जा तथा श्री हनुमान जी का आशीर्वाद और अनुभव है। इससे ध्यान की दिशा में आगे बढ़ने वाले साधकों को उचित मार्गदर्शन प्राप्त होता है। आध्यात्मिक उपन्यासों के अध्ययन से जो ऊर्जा साधक में उत्पन्न होती है, उसी ऊर्जा को साधक के जीवन में सुव्यवस्थित और समन्वित किया जाता है।गुरुजी और गुरु माँ साधक का सूक्ष्म अवलोकन करते हैं और उसी के अनुरूप उसे दिशा‑निर्देश प्रदान करते हैं। जब ध्यान जीवन में उतरता है, तो साधक अपने कार्य और व्यवहार के प्रति अधिक संवेदनशील और सजग हो जाता है।
सेवा
सेवा का धर्म और कर्म एक ऐसा पुरुषार्थ है, जिससे अभिमान की ऊर्जा का शोधन होता है। इसी कारण गुरुजी एवं माँ साधक को यह पुरुषार्थ जीवन में अपनाना अत्यावश्यक बताते हैं। देश, काल और परिस्थिति के अनुसार साधकों को ईशान ध्यान मंदिर में अनेक प्रकार की सेवाओं का कार्य करने का अवसर प्राप्त होगा, जिससे उनके सूक्ष्म अवगुण धीर‑धीरे दूर होते जाएंगे।
सुमिरन
नियमित सुमिरन का अर्थ यहाँ नाम‑जाप से भी है और आध्यात्मिक उपन्यासों के अध्ययन से भी है।
सुमिरन करने से साधक के भक्ति‑भाव और आध्यात्मिक ऊर्जा का विकास होता है। स्वामी जी ने आध्यात्मिक उपन्यासों के अध्ययन के लिए सही और सार्थक समय रात्रि में सोने से पूर्व बताया है, ताकि उस समय निर्मित ऊर्जा समग्र रूप से साधक की चेतना पर कार्य कर सके। इसी के साथ साथ कीर्तन और सत्संग के महत्व को भी अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है। स्वामी जी कहते हैं कि कीर्तन और सत्संग से साधक का वह पात्र निर्मित होता है, जिसमें गुरुजन का ज्ञान समाहित हो सके।
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